मैं - एक अनजान परछाई


ये वक़्त चुभता है,
जाने कैसा दर्द सा देता है,
जो मै खुदसे लड़ने चलु,
तो खुदसे हरा मुझे देता है |


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गिरती है सम्भलती है, फिर खुदको खुदके ही आँचल में समेट वो लेती है| जज्बातो का एक तूफान सा उठता है सीने में पर क्यों उसे आँखों से बहाने में डरती है |

सुयोग्य नहीं तो खोटा सिक्का भी खुदको वो नहीं समझती है, और जो उसे खोटा सिक्का कहते है उनसे बस इतना ही वो कहती है की किस्मत ही तो है ये जो पल पल रंग बदलती है, थी जो कल आपकी चहेती आज क्यों मन को इतना खटकती है! मै वो नहीं जो आप सोचते है या समझते है, मैं वो हूँ जो मैं महसूस करती हूँ |


एक छोटी सी कविता उस अनजान सी परछाई की दिल की कहानी  की शब्दों के बहाने

बया करू जो मैं फ़साना ये,
गुजर सा जाएगा एक जमाना
ना शिकवा है, ना गिला है
अब आँखों में ना ही आंसुओ का काफिला है
फिर भी जैसे दिल कुछ कह रहा है
खेर, लफ्ज़ो में अब वो ताकत कहा 
कर सके जो सब कुछ बया

दिन जब ढलने सा लगता है,
सीने में दर्द कुछ बढ़ने लगता है
दर्द को लिखते लिखते रात बीत जाती है
और सुबह आँखों में लहराने लग जाती है
तब सहमी सहमी सी इन पलकों में
जज्बात सारे चुपके से ढल जाते है
रोना जो चाहे मन तो
हालात ये सारे मुस्कुरा जाते है मेरे
जाने ये कौनसा किस्सा है
जाने ये जिंदगी का कौनसा हिस्सा है
जो आँखों में अश्क़ लहराए तो
लबो पे मुस्कुराहटें बिखर जाती है |

खुद ही मै खुदसे लड़ती हूँ
खुद ही खुद के लिए औरों से झगड़ती हूँ
गिरती हूँ, टूटती हूँ, बिखरती हूँ
पर फिर संभालती हूँ
जो भी मोड़ आए सफर में
अपना हमसफ़र मै स्वयं बनती हूँ
जीवन के हर रंग में
खुदको मैं रंगती हूँ
बस अपने ही संग मैं ये
सफर अपना तय करती हूँ |               

                                     - अनुभा अग्रवाल

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