मंज़िल

आज कल हम सब सिर्फ़ किसी ना किसी दिखावे या पैसे के पीछे भाग रहे है | ना किसी को अपनी सेहत की फ़िक्र है ना सुकून की | जिस ज़िंदगी को हम खुशनुमा करने की चाहत में हम लगे हुए है उसी को अंत में भूल जाते है | बस इसी ज़िंदगी की भागदौड़ को कविता के माध्यम से जाहिर किया गया है...


ना जाने किस दिशा में, किस मंज़िल की ओर पर सब भाग रहे है
रात को सोने की खबर नहीं पर सुबह सब वक्त से जाग रहे है,

कुछ ख़्वाहिशें अपनो की, कुछ अपने ख्वाब लिए
कभी खुद को तो कभी खुदा को भी जाँच रहे है
अपना पता नही औरो के गिरेबान झाँक रहे है
ना जाने किस दिशा में, किस मंज़िल की ओर सब भाग रहे है..

कुछ सावन मे भी झड़ रहे है, कुछ पतझड़ में भी खिल रहे है
विश्वास है तो तूफान मे भी टिके है, नही तो हवा में भी हिल रहे है
खाने मे कचरा है पर पानी को भी छान रहे है
ना जाने किस दिशा में, किस मंज़िल की ओर सब भाग रहे है..

घर क पते नामो से मकान नम्बरो में तब्दील हुए
अपनो के गम छोड़, गैरो की महफ़िल में शामिल हुए
कल कुछ चाहा था, आज कुछ और माँग रहे है
ना जाने किस दिशा में, किस मंज़िल की ओर सब भाग रहे है..

अकेले आए थे, अकेले जाना है, फिर क्यूँ इतना हाँफ रहे है
सोचो जरा, नींद में चल रहे है या सच में हम जाग रहे है??
                                                                             
                                                                            - अंजली शर्मा

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1 Comments

Unknown said…
बेहतरीन कविता है|